एक समय की बात है. एक गावं में एक मुखिया रहता था, वह बहुत दयालू था | उस गांव से एक अतिथि गुजर रहा था और सायंकाल होने की वजह से वह उसी गांव में रुक गया| मुखिया ने उसे रहने
और भोजन का प्रबंध किया है, दूसरे दिने वहा से जाते समय उसने मुखिया को एक सुंदर पत्थर उपहार स्वरूप प्रदान किया|
मुखिया वह पत्थर देख बहुत प्रसन्न हुआ और गांव कि पंचायत ने , उस पत्थर से भगवान शिव की प्रतिमा का निर्माण कर उसे गांव के मंदिर में स्थापित करने का निर्णय लिया और प्रतिमा निर्माण का कार्य गांव के उपप्रधान को सौंप दिया.
उप प्रधान गाँव के सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकार के पास गया और उसे वह पत्थर देते हुए बोला, “मुखिया मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करना चाहते हैं. पंद्रह दिवस के भीतर इस पत्थर से भगवान शिव की प्रतिमा तैयार करना हैं, इस काम के लिए तुम्हें 30 ग्राम स्वर्ण दी जायेंगी.”
30 ग्राम स्वर्ण की बात सुनकर मूर्तिकार ख़ुश हो गया और उपप्रधान के जाने के उपरांत प्रतिमा का निर्माण कार्य प्रारंभ करने के उद्देश्य से अपने औज़ार निकाल लिए. अपने औज़ारों में से उसने एक हथौड़ा लिया और पत्थर तोड़ने के लिए उस पर हथौड़े से वार करने लगा. किंतु पत्थर जस का तस रहा. मूर्तिकार ने हथौड़े के कई वार पत्थर पर किये. किंतु पत्थर नहीं टूटा.
पचास बार कोशिश करने के बाद भी मूर्तिकार
ने अंतिम बार कोशिश करने के उद्देश्य से हथौड़ा उठाया, किंतु यह सोचकर हथौड़े पर प्रहार
करने के पूर्व ही उसने हाथ खींच लिया कि जब पचास बार वार करने से पत्थर नहीं टूटा,
तो अब क्या टूटेगा.
वह पत्थर लेकर वापस उपप्रधान के पास गया और उसे यह कह वापस कर आया कि इस पत्थर को तोड़ना नामुमकिन है. इसलिए वह इससे भगवान की प्रतिमा नहीं नहीं बना पाया|
मुखिया और उपप्रधान को गांव के के लिए प्रतिमा को हर स्थिति में पूर्ण करना था. इसलिए उन्होंने भगवान की प्रतिमा निर्मित करने का कार्य गाँव के एक साधारण से मूर्तिकार को सौंप दिया. पत्थर लेकर मूर्तिकार ने उपप्रधान के सामने ही उस पर हथौड़े से प्रहार किया और वह पत्थर एक बार में ही टूट गया.
पत्थर टूटने के बाद मूर्तिकार प्रतिमा बनाने में जुट
गया. इधर उपप्रधान सोचने लगा कि काश, पहले मूर्तिकार ने एक अंतिम कोशिश और कि
होती, तो सफ़ल हो गया होता और आज 30 ग्राम स्वर्ण का हक़दार बनता |
इस कहानी से सीख
यदि जीवन में सफलता प्राप्त करनी है, तो बार-बार असफ़ल होने पर भी तब तक कोशिश करना नहीं छोड़ना चाहिये, जब तक सफ़लता नहीं मिल जाती.
